Saturday, 31 July 2021

Coding क्या है


 

दोस्तों आपके पास जरूर कोई न कोई स्मार्टफोन होगा, और आप उसमे बहोत सारी चीज़े भी सर्च करते होंगे, अपने बहोत सारी वेबसाइट भी अपने स्मार्टफोन में चलाई होंगी, तो दोस्तों क्या आपको पता है की ये वेबसाइट और सॉफ्टवेयर कैसे बनते हैं? ये बनते है Coding करके, जिसको की एक डेवलपर हे समझ सकता है और बना सकता है 


कंप्यूटर और मोबाइल में आजकल हर किसी की दिलचस्पी होती है, और आजकल हर कोई समय के साथ चलना चाहता ही. अगर आप कंप्यूटर प्रोग्राम, मोबाइल एप, वेबसाइट्स, गेम्स या फिर सॉफ्टवेयर में किसी भी चीज़ को सीखने और करने की रूचि रखते हैं, तो पहले आप को प्रोग्रामिंग सीखना होगी। प्रोग्रामिंग लेंग्वेज का प्रयोग कर के प्रोग्राम बनाए जाते हैं।

हमारे कंप्यूटर, मोबाइल, और वो सभी Smart devices जिनका उसे हम करते हैं, उनसभी में प्रोगरामिंग का उपयोग किआ जाता है. एक प्रोग्रामर बहोत म्हणत करके कोई भी प्रोग्राम को बनता है. वेबसाइट से लेकर सॉफ्टवर्स तक में बिना प्रोगरामिंग और कोडिंग के कुछ भी संभव नहीं है

सभी चीज़े स्मार्ट होती जा रही हैं, जैसे पहले हमे बैंक से पैसे निकलवाने पड़ते थे, फिर एटीएम से हम पैसे निकालने लगे, और अब हम घर बैठे जब चाहे तब किसी को भी ऑनलाइन पैसे ट्रांसफर कर सकते है, और इसमें हमारा टाइम भी बहोत बचता है, और ज्यादा परेशा

Coding को प्रोग्रामिंग के रूप में भी जाना जाता है। कंप्यूटर पर हम जो कुछ भी करते हैं वो सारा काम इसी के जरिए किआ जाता है। Coding के जरिए ही कंप्यूटर को बताया जाता है कि उसे क्या करना है। यानी कंप्यूटर को जिस भाषा को समझता है उसे कोडिंग कहा जाता है। अगर आपको कोडिंग लैंग्वेज आती है तो आप बड़ी आसानी से वेबसाइट्स या ऐप बना सकते हैं। इसके अलावा भी कई सारी चीजें कोडिंग लैंग्वेज से की जा सकती हैं, जैसे Artificial intelligence और रोबोटिक्स.

कंप्यूटर में हमे कोडिंग या प्रोगरामिंग नहीं दिखती है, हमे बस सामने की चीज़े दिखाई देती हैं, कोडिंग और प्रोगरामिंग में फ्रंट एन्ड और बैक एन्ड होता है, जिससे हम कंप्यूटर और स्मार्टफोन का उपयोग कर पाते हैं.

प्रोगरामिंग की बहोत सारी लैंग्वेज होती है, कोई वेब डेवलपमेंट के लिए तो कोई एंड्राइड ऐप्प डेवलपमेंट के लिए यूज़ किआ जाता है, जिसको की हर कोई व्यक्ति बिना नॉलेज के नहीं कर सकता है. प्रोगरामिंग या कोडिंग करने के लिए आपको इसका अच्छे से नॉलेज होना चाइये.नी भी नहीं होती है. तो चलिए जानते हैं की coding क्या है और इससे कैसे आप सीख सकते हैं


कुछ कोडिंग लैंग्वेज जो ज्यादा उपगोय होती हैं

  • C-Language
  • C++
  • Java Script
  • HTML
  • CSS
  • PHP
  • MYSQL
  • JAVA
  • .NET
  • RUBY
  • PYTHON

Thursday, 29 July 2021

Graphic Designing


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Graphic Designing आज के समय का सबसे famous कोर्स है क्योकि आज हम जिस तरफ भी देखते है वहां हमें Graphic Designing के कुछ न कुछ नमूने देखने को जरुर मिल जाता है जैसे stylish Text, Stylish Images और Combined color etc. ये सभी Graphic Designing के अंतगर्त ही आते है. वैसे हम सभी को वही चीज ज्यदा पसंद आता है जिसे हम सब ज्यदा बार देखते है या जिसके बारे ज्यादा सोचते है ठीक वैसे ही Graphic Design है हमें कही न कही Graphic Design के Graphics, Images Combined Color दिख ही जाते है, परिणामस्वरूप, हम उसपर attract हो जाते है, एवं उसके बारे जानने के इच्छुक हो जाते है

Graphic Design in Hindi एक तेजी से उभरता हुआ Industry बन रहा है जो आगे चलकर traffic का एक बहुत बड़ा हिस्सा Graphic Design से belongs करेंगा. जिसका सीधा मतलब है Attraction, क्योकि जो चीज हमें देखने में ज्यदा अच्छा लगता है अक्शर हम उसी के पीछे भागते है ठीक वैसे ही ग्राफ़िक डिजाइनिंग फील्ड है जिसे बहुत लोग पसंद करते है. पर हा जितना हम इसके बारे सोचते है उससे कही आगे ये है. Graphic Design in Hindi एक Arts Field है इसीलिए यह कोर्स उनलोगों के लिए बिलकुल सही है जिन्हें आर्ट्स आता है वो इसमें ज्यादा सुरक्षित महसूस करेनेगें.वैसे देखा जाए तो Graphic Design in Hindi के लिए minimum Qualification 12th ही है पर अगर आप Graduate हो आपके लिए और अच्छा है क्योकि 12th + Graphic Design कोर्स पर जॉब्स लेने में थोड़ी परेशानी होटी है लेकिन Graduate पर बिलकुल परशानी नही होती है और आसानी से जॉब्स मिल जाते है क्योकि Graduation एक undergraduate कोर्स होता है जो हर जहग Eligible होता है, और इतना ही नही आप इसे post Graduate के बाद भी कर सकते है जो आपके फ्यूचर को एक सुनहरा चांस देगा.

raphic Design को Communication Design भी कहा जाता है वैसे इसका नाम और काम दोनों बहुत है पर इसमें Ideas की planning, Projecting, Visual, Clarity in Graphics, Textual Content और Color Combination का होना एक Graphic Design है, जिस form का use करके हम इसे बनाते है वो भौतिक या आभासी दोनों हो सकता है.

दुसरे शब्दों में कहे तो Graphic Design Images, Words, Size ( Circle, Rectangle, hexagon, Triangle, etc.) और Colors Combination का use करके किसी Messages को ब्यक्त करने का एक माध्यम है जिसे Graphic Designing ( in Hindi ) कहा जाता है.Graphic Design अपने आप में एक बहुत ही बड़ी प्रतिष्ठित काम है जिसके लिए आपके पास Creative Ideas का होना बहुत ही जरुरी है और शायद इसीलिए कहा भी जाता है कि Creativity, Graphic डिजाइन की पहली जरुरत है और इसके अलवा Industry के Traids की अच्छी जानकारी का होना लाजमी है.

वैसे तो Graphic Design के बहुत से function होते है और सबका अलग-अलग नाम भी होता है निचे हम कुछ चुनिन्दा नाम दे रहे है जिसका use Graphic Design के अंतगर्त ज्यादा होता है जैसे; साइनिज, Identity Corporate, packaging, Printed Content, Online Banner, Album, Film And Television, Greeting Card आदि सामिल है.

Graphic Designing Course

India में Graphic Design का कोर्स Diploma और Degree दोनों लेवल पर है और Graphic Design Institutes काफी लम्बे समय से Candidates को Training देते आ रहे है. अगर especially India में Graphics Training Institutes की बात करे तो यह बहुत ही अच्छे और Affordable price पर Graphic Design in Hindi Training provide करते है और उनकी विशेषता होती है की software Application Skill अछे से प्रदान करे, जो बहुत बड़ा Benefits इससे trainee को होता है.

और एक Professional Graphic Designer बनने में एक अच्छा योगदान निभाता है और अच्छी वैचारिक knowledge और skill की बहुत आवश्यकता होती है. Graphic Design, Communication Design का एक Important हिस्सा होता है जो प्रत्येक students को यह पता होना चाहिए एक अच्छा Graphic Designer बनने के लिए उन्हें किन-किन पहलुयो पर विशेष ध्यान देना चाहिए.

निचे हम कुछ विशेष पहलुयो पर प्रकाश दाल रहे है जिससे आपका concept clear हो जायेगा. Typography, Typing Design, Photography, Packaging, Print Designer, साइनेज Design और Identity system etc.

Observation दृष्टिकोण का होना बहुत आवश्यक है ताकि अपने डिजाईन को देख कर ये जान सके की आपका क्लाइंट क्या चाहता है,

Artistic Ability, डिज़ाइनरो को अपने डिजाईन बनाने में सक्षम होना चाहिए ताकि वो क्लाइंट के सामने क्लासिक और यूनिक डिजाईन प्रेजेंट कर सके और अपने Ideas को sketching या Computer program के माध्यम से डिजाईन तैयार कर सके.

Communication Skills, Consumers, Client और दुसरे डिज़ाइनरो के साथ अच्छा Communicate कर सके और सुनिश्चित कर सके की उसके द्वारा बनाये गए डिजाईन Massage सटीकता से प्रतिबिंबित करता है.

Computer Skills, अधिकांशतः Designing का कार्य Computer के द्वारा ही तैयार किया जाता है इसलिए आवश्यक है की आपको Computer Knowledge हो.

And Most Important Creativity, हमें अपने क्रिएटिव आइडियाज को ही डिजाईन का रूप देना होता है इसलिए यह सबसे जरुरी है की हमें consumers के विचारो को एक नए तरीके से सोचने में सक्षम होना चाहिए तभी हम क्लाइंट्स को अपने तरफ मोड़ सकते है.

Fees For Graphic Designing Course

जहाँ तक fee का सवाल है तो इंडिया में Graphics Training Institutes बहुत है और उनका Fees भी अलग-अलग होता है पर एक साधारणतः Graphic Design Course Fee 40,000 के आसपास होता है और maximum fees 1,00,000 के near about होता है 

Jobs After Completing Graphic Designing Course

Bachelor in Fine Arts, Post Graduate In Design, Graduate Diploma In Design, Visual Communication Design, Printing And Media Engineering आदि से अपना Graphic Design in Hindi कोर्स पूरा करने के बाद आप Designing के फील्ड में एक बेहतरीन करियर बना सकते है. इस Globalization के मौजूदा दौर में करियर के संभावनाए बहुत है.

कई ऐसे छोटे-बड़े संस्थान है जो अपने लिए visual Brand ready करवाते है. आप उन संस्थानों के साथ जुड़ कर आसानी से काम कर सकते है. या फिर Graphic Designers की Websites, Magazines, Books, Posters, Banners, computers Games, Product Packaging, Communication, Online Design, Corporate, Identity आदि जैसे जगहों पर अच्छे salary package के साथ काम कर सकते है जो आपके करियर को एक नइ उचाई देगा.

Conclusion

जैसा की मैंने पहले बताया कि Graphic Design In Hindi कोर्स बहुत ही trending फील्ड है इसमें जॉब्स opportunities बहुत है. इसके लिए हमें थोडा सा creative और थोड़ा extra thinking की आवश्यकता होती है तभी हम एक बेहतर Graphic Designer बन सकते है जिसे आपने Graphic Design in Hindi के माध्यम से जाना है, उम्मीद करता है कि आपको यह लेख पसंद आया होगा और अगर ऐसी कोई कमी नजर आई हो तो प्लीज कमेंट में अपना विचार मेंशन करना न भूले. Thanks


Friday, 19 February 2021

system properties क्या है

 




System properties   - SP esa dEI;wVj fd lHkh Software And Hardware tkudkjh  (information) dks crk;k tkrk gS tSlsa fd 

1- os(operating system)   

  - dEI;wVj dks pykus okyk lkW¶Vos;j ftls foaMksl  ds uke ls tkuk tkrk gS A                                                                                                                                                                       2. processor fo your PC       

 -dEI;wVj esa pyus okyh izkslsl dks fu;ak=.k djus okyh gkMZos;j fpi tks izkslslj dgykrk gSa                                                                                                                                                                            

  3.RAM of your PC          

     - tks dEI;wVj dks rst ,ao ,d lakFk vusd d;kZ djus ;ksX; oukrh gSA                                                                                                                                                                    4. generation of your PC -

   dEI;wVj fdl ihMh dk gS tkuus ds fy,A   




 


Tuesday, 9 February 2021

What is Memory (मेमोरी क्या हैं?)


                          PANKAJ SIR यह Device Input Device के द्वारा प्राप्त निर्देशों को Computer में संग्रहण (Store) करके रखता है इसे Computer की याददाश्त भी कहाँ जाता है| मानव में कुछ बातों को याद रखने के लिये मष्तिस्क होता है, उसी प्रकार Computer में डाटा को याद रखने के लिए मेमोरी (Memory)  होती हैं| यह मेमोरी C.P.U का अभिन्न अंग है,इसे Computer की मुख्य मेमोरी (Main memory), आंतरिक मेमोरी (Internal Memory), या प्राथमिक मेमोरी (Primary Memory) भी कहते हैं| 

     किसी भी निर्देश, सूचना, अथवा परिणामों को स्टोर करके रखना मेमोरी कहलाता हैं|

कंप्यूटरो में एक से अधिक मेमोरी होती है हम उनको सामान्यतः प्राथमिक (Primary) व द्वितीयक (Secondary) मेमोरी के रूप में वर्गीकृत कर सकते है  प्राथमिक मेमोरी अस्थिर (Volatile) तथा स्थिर (Non-Volatile) दोनों प्रकार कि होती है| अस्थिर मेमोरी (Temprery Memory) डेटा को अस्थाई रूप से कंप्यूटर ऑन होने से लेकर कंप्यूटर बंद होने तक ही रखते है अर्थात कंप्यूटर अचानक बंद होने या बिजली के जाने पर कंप्यूटर से डाटा नष्ट हो जाता है स्थिर मेमोरी (Permanent Memory) आपके कंप्यूटर को प्रारंभ करने में सहायक होती हैं| इसमें कुछ अत्यंत उपयोगी फर्मवेयर होते है जो कंप्यूटर को बूट करने में मदद करते है बूटिंग कंप्यूटर को शुरू करने कि प्रक्रिया को कहा जाता है इसे मुख्य मेमोरी कहा जाता हैं| द्वितीयक संग्रहण वह है जो हमारे डाटा को लंबे समय तक रखता है द्वितीयक संग्रहण कई रूपों में आते हैं| फ्लोपी डिस्क, हार्ड डिस्क, सी.डी. आदि |

बिट अथवा बाइट

मेमोरी में स्टोर किया गया डाटा 0 या 1 के रूप में परिवर्तित हो जाता है 0 तथा 1 को संयुक्त रूप से बाइनरी डिजिट कहा जाता हैं| संक्षेप में इन्हें बिट भी कहा जाता हैं| यह बिट कंप्यूटर कि मेमोरी में घेरे गे स्थान को मापने की सबसे छोटी इकाई होती हैं|

8 Bits = 1 Bytes

1024 Bytes = 1 Kilobyte (1 KB)

1024 KB = 1 Megabyte (1MB)

1024 MB = 1 Gigabyte (1 GB)

1024 GB = 1 Terabyte (1 TB)

मेमोरी के प्रकार (Types of Memory)प्राइमरी मेमोरी

 (Primary Memory)प्राइमरी मेमोरी (Primary Memory)

Memory कंप्यूटर का सबसे महत्वपूर्ण भाग है जहाँ डाटा, सूचना, एवं प्रोग्राम प्रक्रिया के दौरान उपस्थित रहते है और आवश्यकता पड़ने पर तत्काल उपलब्ध रहते है यह मेमोरी अस्थिर मेमोरी होती है क्योकि इसमें लिखा हुआ डाटा कंप्यूटर बंद होने या बिजली के जाने पर मिट जाता है प्राइमरी मेमोरी कहलाती हैं| इसे प्राथमिक मेमोरी या मुख्य मेमोरी भी कहते हैं|

सेकेंडरी मेमोरी क्या हैं?

सेकेंडरी मेमोरी क्या हैं? (What is Secondary Memory)

Secondary Storage Device को Auxiliary Storage Device भी कहा जाता है। यह कम्प्यूटर का भाग नही होती है। इसको कम्प्यूटर में अलग से जोडा जाता है। इसमें जो डाटा स्टोर किया जाता है। वह स्थाई होता है। अर्थात् कम्प्यूटर बंद होने पर इसमें स्टोर डाटा डिलीट नही होता है। आवश्यकता के अनुसार इसको भविष्य में इसमें सेव फाईल या फोल्डरों को खोल कर देख सकते है। या इसमें सुधार कर सकते है। एवं इसको यूजर के द्वारा डिलिट भी किया जा सकता है। इसकी Storage क्षमता अधिक होती है Secondary Storage Device में Primary memory की अपेक्षा कई गुना अधिक डाटा स्टोर करके रख सकते हैं, जो की स्थानांतरणीय (Transferable) होता हैं एवं डाटा को ऐक्सेस करने कि गति Primary Memory से धीमी होती है। Secondary Memory में फ्लॉपी डिस्क, हार्डडिस्क, कॉम्पेक्ट डिस्क, ऑप्टिकल डिस्क, मेमोरी कार्ड, पेन ड्राइव आदि आते हैं|

Hard                         PANKAJ SIR 

Hard Disk या HDD एक ही बात है, ये एक physical disk होती है जिसको हम अपने computer की सभी छोटी बड़ी files store करने के लिये प्रयोग करते है। Hard disk और RAM मे ये फर्क होता है कि, Hard disk वो चीज है जो store करने के काम मे आती है, लेकिन RAM उस storage मे रखी चीजो को चलाने के काम में आती है। जब हम computer को बन्‍द करते है तो RAM मे पडी कोई भी चीज साफ हो जाती है। लेकिन HDD मे computer बन्‍द होने पर भ्‍ाी data erase ni hota Hard disk के अन्‍दर एक disk घुमती है, जितनी तेज disk घुमती है उतनी ज्‍यादा तेजी से ये Data को store या read कर सकती है। Hard disk के घुमने की speed को हम RPM (Revolutions Per Minute) मे नापते है। ज्‍यादातर Hard disk 5400 RPM या 7200 RPM की होती है, जाहिर सी बात है 7200 RPM की hard disk 5400 RPM वाली से ज्‍यादा तेज होती है।

संरचना एवं कार्यविधि

हार्डडिस्क चुम्बकीय डिस्क से मिलकर बनी होती है। इसमें डाटा को पढ़ने एवं लिखने के लिये एक हेड होता है। हार्डडिस्क में एक central shaft  होती है। जिसमें चुम्बकीय डिस्क लगी रहती है। हार्डडिस्क की ऊपरी सतह पर एवं निचली सतह पर डाटा को स्टोर नहीं किया जाता है। बाकि सभी सतहों पर डाटा को स्टोर किया जाता है। डिस्क की प्लेट में Track and Sector होते है। सेक्टर में डाटा स्टोर होता है, एक सेक्टर में 512 बाइट डाटा स्टोर होता है।

डाटा को स्टोर एवं पढ़ने के लिये तीन तरह के समय लगते है। जो निम्न है।
1. Seek Time:-. डिस्क में डाटा को रीढ या राईट करने वाले Track तक पहुँचने में  लगा समय सीक टाइम कहलाता है।
2. Latency time:- Track में डाटा के Sector तक पहुँचने मे लगा समय लेटेंसी टाईम कहलाता है।
3. Transfer Rate:- Sector में डाटा को लिखने एवं पढने में जो समय लगता है। उसे Transfer Rate कहा जाता है।

फ्लॉपी डिस्क (Floppy Disk)

यह प्लास्टिक की बनी होती है जिस पर फेराइट की परत पड़ी रहती है | यह बहुत लचीली प्लास्टिक की बनी होती है| इसलिए इसे फ्लॉपी डिस्क (Floppy Disk) कहते है| जिस पर प्लास्टिक का कबर होता है| जिसे जैकेट कहते है| फ्लॉपी (Floppy) के बीचों-बीच एक पॉइंट (Point) बना होता है जिससे इस ड्राइव (Drive) की डिस्क (Disk) घूमती है| इसी फ्लॉपी डिस्क (Floppy Disk) में 80 डेटा ट्रेक (Data track) होते है और प्रत्येक ट्रेक (Track) में 64 शब्द स्टोर (Store) किये जा सकते है| यह मेग्नेटिक  टेप (Magnetic tape) के सामन कार्य करती है| जो 360 RPM प्रति मिनिट की दर से घूमती है| जिससे इसकी Recording head के ख़राब हो जाने की समस्या उत्पन्न होती है|

floppy

आकर की द्रष्टि से फ्लॉपी (Floppy) दो प्रकार की होती है :-

5½ व्यास वाली फ्लॉपी डिस्क (Floppy Disk)

3½ व्यास वाली फ्लॉपी डिस्क (Floppy Disk)

 व्यास वाली फ्लॉपी डिस्क (Floppy Disk) – इसका अविष्कार सन 1976 में किया गया था तथा यह भी प्लास्टिक की जैकेट से सुरक्षित रहती है| इसकी संग्रह क्षमता 360 KB से 2.44 MB तक की होती है |

 व्यास वाली फ्लॉपी डिस्क (Floppy Disk) – इसका प्रयोग (use) सर्वप्रथम एप्पल कंप्यूटर (Apple computer) में किया गया था| जो पिछली फ्लॉपी की अपेक्षा छोटी होती है| इसकी संग्रह क्षमता 310 KB से 2.88 MB तक होती है|

Magnetic Tape

Magnetic tape भी एक Storage Device हैं जिसमे एक पतला फीता होता हैं जिस पर Magnetic Ink की Coading की जाती हैं इसका प्रयोग Analog तथा Digital Data को Store करने के लिए किया जाता हैं | यह पुराने समय के Audio कैसिट की तरह होता हैं Magnetic Tape का प्रयोग बड़ी मात्रा में डाटा Store करने के लिए किया जाता हैं| यह सस्ते होते हैं| आज भी इसका प्रयोग data का Backup तैयार करने के लिए किया जाता हैं |

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Optical Disk

Optical Disk एक चपटा, वृत्ताकार पोलिकर्बिनेट डिस्क होता है, जिस पर डाटा एक Flat सतह के अन्दर Pits के रूप में Store किया जाता हैं इसमें डाटा को Optical के द्वारा Store किया जाता है|

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ऑप्टिकल डिस्क दो प्रकार की होती है।

CD:- सबसे पहले बात करते है सीडी की, सीडी का हम काम्‍पैक्‍ट डिस्‍क के नाम से भी पुकारते हैं ये एक ऐसा ऑप्‍टिकल मीडियम होता है जो हमारे डिजिटल डेटा का सेव करता है। एक समय था जब हम रील वाले कैसेट प्रयोग करते थी, सीडी के अर्विष्‍कार ने ही बाजार में कैसेटों को पूरी तरह से खत्‍म कर दिया। एक स्‍टैंडर्ड सीडी में करीब 700 एमबी का डेटा सेव किया जा सकता है। सीडी में डेटा डॉट के फार्म में सेव होता है, दरअसल सीडी ड्राइव में लगा हुआ लेजर सेंसर सीडी के डॉट से रिफलेक्‍ट लाइट का पढ़ता है और हमारी डिवाइस में इमेज क्रिएट करता है।
DVD:- डीवीडी यानी डिजिटल वर्सटाइल डिस्‍क, सीडी के बाद डीवीडी का आगाज हुआ वैसे तो देखने में दोनों सीडी और डीवीडी दोनों एक ही जैसे लगते है मगर इनकी डेटा कैपसेटी में अंतर होता है सीडी के मुकाबले डीवीडी में ज्‍यादा डेटा सेव किया जा सकता है। मतलब डीवीडी में यूजर करीब 4.7 जीबी से लेकर 17 जीबी तक डेटा सेव कर सकता है। डीवीडी के आने के बाद बाजार में सीडी की मांग में भारी कमी देखी गई।

Flash Drive

Pen Drive को ही Flash Drive के नाम से जाना जाता हैं आज कल सबसे ज्यादा Flash Drive का Use डाटा Store करने के लिए किया जाता है यह एक External Device है जिसको Computer में अलग से Use किया जाता हैं | यह आकार में बहुत छोटे तथा हल्की भी होती हैं, इसमें Store Data को पढ़ा भी जा सकता है और उसमे सुधार भी किया जा सकता हैं |

Flash Drive में एक छोटा Pried Circuit Board होता है जो प्लास्टिक या धातु के Cover से ढका होता हैं इसलिए यह मजबूत होता है | यह Plug-and-Play उपकरण है | आज यह सामान्य रूप से 2 GB, 4 GB, 8 GB, 16 GB, 32 GB, 64 GB, 128 GB आदि क्षमता में उपलब्ध हैं|

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Memory Card

मेमोरी कार्ड छोटा स्टोरेज माध्यम माना जाता है जिसका उपयोग आमतौर पर सूचनाओं को संग्रहीत करने के लिए किया जाता है। मेमोरी कार्ड एक प्रकार का स्टोरेज मीडिया है जो अक्सर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में फोटो, वीडियो या अन्य डेटा स्टोर करने के लिए उपयोग किया जाता है। आमतौर पर मेमोरी कार्ड का उपयोग करने वाले उपकरणों में डिजिटल कैमरा, डिजिटल कैमकोर्डर, हैंडहेल्ड कंप्यूटर, एमपी 3 प्लेयर, पीडीए, सेल फोन, गेम कंसोल और प्रिंटर शामिल हैं। इसका उपयोग छोटे, पोर्टेबल और दूरस्थ कंप्यूटर उपकरणों के लिए भी किया जाता है।

मेमोरी कार्ड के प्रकार के आधार पर स्टोरेज स्पेस की मात्रा में भिन्न हो सकते हैं। हालांकि, सामान्य तौर पर, अधिकांश मेमोरी कार्ड आज आकार में 4 जीबी (गीगाबाइट) से लेकर 128 जीबी तक होते हैं। पुराने मेमोरी कार्ड 4 जीबी से भी छोटे होते थे|

बाजार पर विभिन्न प्रकार के मेमोरी कार्ड उपलब्ध हैं, सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले प्रकार के मेमोरी कार्ड की अधिक जानकारी के लिंक नीचे सूचीबद्ध हैं।

  • CF (CompactFlash)
  • MicroSD
  • MMC
  • SD Card
  • SDHC Card
  • SmartMedia Card
  • Sony Memory Stick
  • xD-Picture Card

Zip Drive

ज़िप ड्राइव एक छोटी, पोर्टेबल डिस्क ड्राइव है जिसका उपयोग मुख्य रूप से व्यक्तिगत कंप्यूटर फ़ाइलों का बैकअप लेने और स्टोर करने के लिए किया जाता है। ट्रेडमार्क युक्त ज़िप ड्राइव को 1990 के मध्य में Iomega Corporation द्वारा विकसित किया गया था। जिप ड्राइव और डिस्क दो आकारों में आते हैं। 100 मेगाबाइट का आकार वास्तव में 100,431,872 बाइट डेटा या 70 फ़्लॉपी डिस्केट के बराबर होता है। 250 मेगाबाइट ड्राइव और डिस्क भी है। Iomega ज़िप ड्राइव एक सॉफ़्टवेयर उपयोगिता के साथ आता है जो आपको अपनी हार्ड ड्राइव की संपूर्ण सामग्री को एक या अधिक ज़िप डिस्क पर कॉपी करने देता है। यह लॉन्च के समय लोकप्रिय था क्योंकि प्रति स्टोरेज इकाई लागत हार्ड डिस्क की तुलना में कम थी, और यह एक फ्लॉपी डिस्क की तुलना में बड़ी मात्रा में डेटा स्टोर कर सकती थी। ज़िप ड्राइव तेजी से डेटा ट्रान्सफर करने में सक्षम टिकाऊ और विश्वसनीय थी|

Magnetic Disk

मैग्नेटिक डिस्क एक स्टोरेज डिवाइस है जो डेटा को Write, Rewrite और Access करने के लिए मैग्नेटाइजेशन प्रक्रिया का उपयोग करता है। यह एक चुंबकीय कोटिंग के साथ कवर किया गया है और ट्रैक्स, स्पॉट और सेक्टर के रूप में डेटा संग्रहीत करता है। हार्ड डिस्क, जिप डिस्क और फ्लॉपी डिस्क चुंबकीय डिस्क के सामान्य उदाहरण हैं।

चुंबकीय डिस्क में मुख्य रूप से एक घूर्णन चुंबकीय सतह (rotating magnetic surface) और एक यांत्रिक भुजा (mechanical arm) होती है जो उस पर चलती है। मैकेनिकल आर्म का उपयोग डिस्क से पढ़ने और लिखने के लिए किया जाता है। चुंबकीय डिस्क पर डेटा को एक चुंबकीयकरण प्रक्रिया का उपयोग करके पढ़ा और लिखा जाता है। डेटा को डिस्क पर ट्रैक और सेक्टर के रूप में व्यवस्थित किया जाता है, जहां ट्रैक डिस्क के परिपत्र विभाजन होते हैं। ट्रैक को उन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है जिनमें डेटा के ब्लॉक हैं। चुंबकीय डिस्क पर सभी पढ़ने और लिखने का कार्य क्षेत्रों पर किया जाता 

Thursday, 12 March 2020

E-गवर्नेंस क्या हैं | DCA AND PG cecond sem

ई–गवर्नेंस क्या हैं|


इ गवर्नेंस का मतलब सभी सरकारी कार्यों को ऑनलाइन सर्विस के माध्यम से जनता तक आसानी से पहुंचाना| जिससे सरकारी कार्योलयों और जनता दोनों के पैसे और समय की बचत हो सके, और बार बार आपको विभिन्न दफ्तरों के चक्कर न लगाना पड़े|
सरकार की आम नागरिकों के लिए उपलब्ध सुविधाओं को इंटरनेट के माध्यम से उपलब्ध कराना ई-गवर्नेंस या ई-शासन कहलाता है। इसके अंतर्गत शासकीय सेवाएँ और सूचनाएँ ऑनलाइन उपलब्ध होती हैं। 

अंतर्गत आने वाले कार्य

  • आप ऑनलाइन बैंकिंग के जरिये सभी बेकिंग सेवाओ का लाभ उठा सकते हैं|
  • GST से सम्बंधित सभी कार्य ऑनलाइन ही कर सकते हैं|
  • बिजली, पानी, टेलीफोन, मोबाइल, DTH इत्यादि के बिल ऑनलाइन भरे जा सकते हैं|
  • PAN कार्ड, आधार कार्ड, राशन कार्ड, पासपोर्ट, जाती प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र का सत्यापन|
  • आयकर रिटर्न फाइलिंग के सभी कार्य ऑनलाइन किये जा सकते हैं||

Types of E-governance

E-governance 4 प्रकार की होती है और चारो की एक अलग प्रणाली तथा कार्य श्रंखला होती है| जिसके तहत वह कार्य करती है, इसमे एक पूरा System बना होता है, जो उदेश्य प्राप्ति के लिए मदद करता है| इसके प्रकार कुछ इस प्रकार है:-
1. G2G (Government to Government):- जी 2 जी यानी सरकार से सरकार, जब सूचना और सेवाओं का आदान-प्रदान सरकार की परिधि में होता है, इसे जी 2 जी इंटरैक्शन कहा जाता है| ।
2. G2C (Government to Citizen):- जी 2 सी यानी सरकार से नागरिक, यह सरकार और आम जनता के बीच बातचीत को जी 2 सी कहते है। यहां एक प्रकिया सरकार और नागरिकों के बीच स्थापित कि गई है, जिससे नागरिक विभिन्न प्रकार की सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच सकते हैं। नागरिकों को किसी भी समय, कहीं भी सरकारी नीतियों पर अपने विचारों और शिकायतों को साझा करने की स्वतंत्रता है।
3. G2B (Government to Business):- जी 2 बी यानी सरकार से व्यवसाय, इसमे ई-गवर्नेंस बिजनेस क्लास को सरकार के साथ सहज तरीके से बातचीत करने में मदद करता है। इसका उद्देश्य व्यापार के माहौल में और सरकार के साथ बातचीत करते समय पारदर्शिता स्थापित करना है

ई-गवर्नेंस के चरण

विभिन्न शोध अध्ययनों में यह स्पष्ट है कि ई-गवर्नेंस मौलिक रूप से कंप्यूटर प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर और संचार प्रणालियों की नेटवर्किंग के विकास से जुड़ा हुआ है। भारत में ई-गवर्नेंस की शुरुआत चार चरणों से हुई
  • कम्प्यूटरीकरण (Computerization): पहले चरण में, व्यक्तिगत कंप्यूटर की उपलब्धता के साथ सभी सरकारी कार्यालय में पर्सनल कंप्यूटर स्थापित किये गए| कंप्यूटर का उपयोग वर्ड प्रोसेसिंग के साथ शुरू हुआ, इसके बाद डेटा प्रोसेसिंग में तेजी आई।
  • नेटवर्किंग: इस चरण में, कुछ सरकारी संगठनों की कुछ इकाइयाँ को विभिन्न सरकारी संस्थाओं के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान और डेटा के प्रवाह के लिए एक हब के माध्यम से जोड़ा गया।
  • ऑन-लाइन उपस्थिति (On-line presence): तीसरे चरण में, इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ने के साथ, वेब पर उपस्थिति बनाए रखने के लिए एक आवश्यकता महसूस की गई। इसके परिणामस्वरूप सरकारी विभागों और अन्य संस्थाओं द्वारा वेबसाइटों का रखरखाव किया गया। आम तौर पर, इन वेब-पृष्ठों / वेब-साइटों में संगठनात्मक संरचना, संपर्क विवरण, रिपोर्ट और प्रकाशन, संबंधित सरकारी संस्थाओं के उद्देश्य और दृष्टि विवरण के बारे में जानकारी होती थी।
  • ऑनलाइन अन्तरक्रियाशीलता (Online interactivity): ऑन-लाइन उपस्थिति का एक स्वाभाविक महत्व सरकारी संस्थाओं और नागरिकों, नागरिक समाज संगठनों आदि के बीच संचार चैनलों का खोला जाना था। इस चरण का मुख्य उद्देश्य डाउनलोड करने योग्य फॉर्म प्रदान करके सरकारी संस्थाओं के साथ व्यक्तिगत इंटरफ़ेस के दायरे को कम करना था।
इसलिए ई-गवर्नेंस भारत के लिए एक उत्कृष्ट अवसर देता है ताकि शासन की गुणवत्ता में मौलिक सुधार हो सके और इस तरह
  • न केवल सेवा वितरण के लिए बल्कि नीतियों और सरकार के प्रदर्शन पर नागरिकों की राय प्राप्त करने के लिए सरकार और नागरिकों के बीच दो-तरफ़ा संचार की अनुमति दें।
  • बहिष्कृत समूहों तक अधिक पहुंच प्रदान करें, जिनके पास सरकार के साथ बातचीत करने और इसकी सेवाओं और योजनाओं से लाभ उठाने के कुछ अवसर हैं।
  • समाज के सभी वर्गों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करें।
  • आबादी के ग्रामीण और पारंपरिक रूप से हाशिए के क्षेत्रों को सक्षम करने के लिए अपने स्वयं के पड़ोस में सेवाओं के लिए तेजी से और सुविधाजनक पहुंच प्राप्त करें।

ई-गवर्नेंस के लाभ 


  • ई-गवर्नेंस शासन में सुधार है जो सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के संसाधन उपयोग द्वारा सक्षम है।
  • ई-गवर्नेंस सभी नागरिकों के लिए सूचना और उत्क्रिस्ट सेवाओं की बेहतर पहुंच बनाता है।
  • यह सरकार में सरलता, दक्षता और जवाबदेही भी लाता है।
  • आईसीटी के उपयोग के माध्यम से शासन को व्यापक व्यापार प्रक्रिया के साथ संयुक्त रूप से पुनर्व्यवस्थित करने से जटिल प्रक्रियाओं का सरलीकरण, संरचनाओं में सरलीकरण और विधियों और नियमों में बदलाव होगा।

(मल्टीमीडि) क्या हैं|


मल्टीमीडि) क्या हैं|





ल्टीमीडिया कई सारे तत्वों जैसे – टेक्स्ट, इमेज, आर्ट, साउण्ड, animation and video इत्यादि का समूह है। इन सभी तत्वों को किसी कंप्यूटर या किसी दूसरी इलैक्ट्राॅनिक डिवाइस के माध्यम से डिलीवर किया जाता है। मल्टीमीडिया आज के समय मे सूचना तथा प्रौद्योगिकी का अत्याधिक महत्वपूर्ण तथा लोकप्रिय क्षेत्र है। मल्टीमीडिया दो शब्दों से मिलकर बना है। मल्टी़मीडिया में मल्टी का अर्थ है बहुत सारे तथा मीडिया का अर्थ है पैकेज या elements जैसेः टैक्स्ट, इमेज, ऑडियो, वीडियो, एनीमेशन आदि


मल्टीमीडिया सिस्टम

मल्टीमीडिया सिस्टम मल्टीमीडिया डेटा और एप्लिकेशन को संसाधित करने में सक्षम प्रणाली है। मल्टीमीडिया सिस्टम वह है जो मल्टीमीडिया सूचना के प्रसंस्करण (Processing), भंडारण (Storage), उत्पादन (generation), तथा हेरफेर (manipulation) कर सके|

मल्टीमीडिया सिस्टम के लक्षण

एक मल्टीमीडिया प्रणाली में चार बुनियादी विशेषताएं हैं:
  • मल्टीमीडिया सिस्टम को कंप्यूटर नियंत्रित होना चाहिए।
  • मल्टीमीडिया सिस्टम एक एकीकृत सिस्टम होता है मतलब प्रसंस्करण (Processing), भंडारण (Storage), उत्पादन (generation), तथा हेरफेर (manipulation) एक ही सिस्टम से पुरे किया जा सकें|
  • मल्टीमीडिया सिस्टम द्वारा प्रयोग जानकारी को डिजिटल रूप से दर्शाया जाना चाहिए।
  • मीडिया की अंतिम प्रस्तुति के लिए इंटरफ़ेस आमतौर पर इंटरैक्टिव होता है।

एक मल्टीमीडिया सिस्टम के घटक

कैप्चर करने वाले उपकरण (Capture Devices)
– वीडियो कैमरा, वीडियो रिकॉर्डर, ऑडियो माइक्रोफोन, कीबोर्ड, माउस, 3 डी इनपुट डिवाइस, स्पर्श सेंसर, वीआर डिवाइस। डिजीटलिंग / सैम्पलिंग हार्डवेयर
भंडारण उपकरण (Storage Devices)
– हार्ड डिस्क, सीडी-रोम, डीवीडी, आदि
संचार नेटवर्क (Communication Networks)
– इथरनेट, टोकन रिंग, एफडीडीआई, एटीएम, इंट्रानेट, इंटरनेट्स।
कंप्यूटर सिस्टम (Computer Systems)
– मल्टीमीडिया डेस्कटॉप मशीन, वर्कस्टेशन, एमपीईजी / वीडियो / डीएसपी हार्डवेयर
आउटपुट डिवाइस (Display Devices)
– सीडी-क्वालिटी स्पीकर, एचडीटीवी, एसवीजीए, हाय-रेस मॉनिटर, कलर प्रिंटर आदि

Wednesday, 11 March 2020

वर्चुअल रियालिटी क्या हैं | students for DCA AND PG

र्चुअल रियालिटी एक कम्प्यूटर सिस्टम हैं जिसका प्रयोग एक काल्पनिक दुनिया को क्रिएट करने के लिये किया जाता है
virtual reality 
   का प्रयोग अक्सर 3D वातावरण उच्च विजुअल मल्टीमीडिया इत्यादि से संबंधित एप्लीकेशन्स के लिये किया जाता है। वर्चुअल रियालिटी आपको कम्प्यूटर के द्वारा जनरेट की गयी दुनिया मे होने का यह एहसास कराती है। जैसे-हम कम्प्यूटर पर कार रेस गेम खेलते है। तो हम उस खेल मे इस तरह समाहित हो जाते है, कि हमे ऐसा लगता है कि हम वास्तविक रूप से ही कार को ड्राइव कर रहे है। लेकिन actually मे ऐसा नही होता है

virtual reality को स्पष्ट रूप से समझने के लिये हम मूवी का उदाहरण लेते है। जब हम मूवी थियेटर मे मूवी देख रहे होते है। तो हमारे सामने जेा घटना घट रही होती है। उसे देखकर हमे लगता है, कि जो कुछ भी सामने हो रहा है, वह actually मे हो रहा है, जबकि वह घटना काल्पनिक है। इस तरह हम virtual reality को संक्षिप्त रूप से इस तरह परिभाषित कर सकते है। कि virtual reality एक ऐसा concept है जो हमे किसी घटना के actually मे होना या आभास कराता है, लेकिन वास्तव मे ऐसा नही होता है। कि ये जो कुछ भी घट रहा है। वह Actually मे क्रियान्वित हो रहा है

वर्चुअल रियालिटी का इतिहास _              pankaj sir 

वर्चुअल रियालिटी शब्द वर्ष 1987 मे जेरान लेलियर ने बनाया था जिसकी अनुसंधान और इंजीनियरिंग ने नये विकास उद्योग मे अनेक उत्पादो को योगदान दिया है। अमेरिकी सरकार और विशेेषकर उसका रक्षा विभाग नेशनल साइन्स फाउन्डेशन तथा नेशानल एरोनटिक्स एण्ड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) द्वारा विश्वविद्यालय में स्थित प्रयोगशालाओं को अनुसंधान हेतु वित्तीय अनुदान मिला और इसके परिणमस्वरूप इस क्षेत्र में निपुण व्यक्तियों को विशिष्ट क्षेत्रों में विशेषज्ञ बना कर तैयार किया ये क्षेत्र कम्प्यूटर ग्राफिक्स सिमुलेंशन तथा नेटवर्क से बने वातावरण तथा शैक्षिक, सेना तथा काॅमर्शियल काम के बीच सम्पर्क इत्यादि है। वर्चुअल रियालिटी के बारे में सन् 1965 के आसपास विचार किया गया था जब Ivan Sutherland ने वर्चुअल अथवा इमेजनरी संसार के निर्माण के लिये अपने सुझाव प्रस्तुत किए थे। 1969 ये उसने पहले ऐसे सिस्टम का निर्माण किया जो लोगों को सूचना के थ्री-डामेन्शनल डिस्प्ले में बाॅधता था 1970 तथा 1980 के मध्य में वर्चुअल रियलिटी की अवधारणा का मुख्य उपयोग United States ने किया था 
सन् 1962 में Ivan Sutherland ने एक light pen का विकास किया जिसके द्वारा कम्प्यूटर पर तस्वीरें स्केच की जा सकती थी। 1970 तक Sutherland ने कम्प्यूटर ग्राफिक्स में Scientific Visualization का उपयोग डाटा के Columns को तस्वीरों में परिवर्तित करने के लिए भी किया गया था। Scientific Visualization के उद्देश्य अपनी तस्वीरों में सिस्टम्स अथवा प्रोसेस की डाइनेमिक विशेेषताओं को कैप्चर करना था। 1980 में Scientific Visualization, Hollywood की कई स्पेशल इफैक्ट वाली विधियों को निर्माण तथा Borrowing एनीमेशन की तरह चला गया 1990 में NCSA अवार्ड विनिंग Smog एनीमेशन जो Los Angeles पर Descend कर रही थी ने State में Antipollution Legislature को प्रभावित किया वैज्ञानिकों को इन्ट्र्क्टिविटी चाहिए थी तथा मिलेटरी इंडस्ट्री, बिजनैस तथा मनोरंजन की परस्पर सबन्धों की आवश्यकता थी

Modem क्या है 1 -और कितने प्रकार के होते हैं====!

Modem का Full Form होता है “Modulator / Demodulator.” यह एक ऐसा hardware component होता है जो की allow करता है एक computer या दुसरे device क...