Thursday, 12 March 2020

E-गवर्नेंस क्या हैं | DCA AND PG cecond sem

ई–गवर्नेंस क्या हैं|


इ गवर्नेंस का मतलब सभी सरकारी कार्यों को ऑनलाइन सर्विस के माध्यम से जनता तक आसानी से पहुंचाना| जिससे सरकारी कार्योलयों और जनता दोनों के पैसे और समय की बचत हो सके, और बार बार आपको विभिन्न दफ्तरों के चक्कर न लगाना पड़े|
सरकार की आम नागरिकों के लिए उपलब्ध सुविधाओं को इंटरनेट के माध्यम से उपलब्ध कराना ई-गवर्नेंस या ई-शासन कहलाता है। इसके अंतर्गत शासकीय सेवाएँ और सूचनाएँ ऑनलाइन उपलब्ध होती हैं। 

अंतर्गत आने वाले कार्य

  • आप ऑनलाइन बैंकिंग के जरिये सभी बेकिंग सेवाओ का लाभ उठा सकते हैं|
  • GST से सम्बंधित सभी कार्य ऑनलाइन ही कर सकते हैं|
  • बिजली, पानी, टेलीफोन, मोबाइल, DTH इत्यादि के बिल ऑनलाइन भरे जा सकते हैं|
  • PAN कार्ड, आधार कार्ड, राशन कार्ड, पासपोर्ट, जाती प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र का सत्यापन|
  • आयकर रिटर्न फाइलिंग के सभी कार्य ऑनलाइन किये जा सकते हैं||

Types of E-governance

E-governance 4 प्रकार की होती है और चारो की एक अलग प्रणाली तथा कार्य श्रंखला होती है| जिसके तहत वह कार्य करती है, इसमे एक पूरा System बना होता है, जो उदेश्य प्राप्ति के लिए मदद करता है| इसके प्रकार कुछ इस प्रकार है:-
1. G2G (Government to Government):- जी 2 जी यानी सरकार से सरकार, जब सूचना और सेवाओं का आदान-प्रदान सरकार की परिधि में होता है, इसे जी 2 जी इंटरैक्शन कहा जाता है| ।
2. G2C (Government to Citizen):- जी 2 सी यानी सरकार से नागरिक, यह सरकार और आम जनता के बीच बातचीत को जी 2 सी कहते है। यहां एक प्रकिया सरकार और नागरिकों के बीच स्थापित कि गई है, जिससे नागरिक विभिन्न प्रकार की सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच सकते हैं। नागरिकों को किसी भी समय, कहीं भी सरकारी नीतियों पर अपने विचारों और शिकायतों को साझा करने की स्वतंत्रता है।
3. G2B (Government to Business):- जी 2 बी यानी सरकार से व्यवसाय, इसमे ई-गवर्नेंस बिजनेस क्लास को सरकार के साथ सहज तरीके से बातचीत करने में मदद करता है। इसका उद्देश्य व्यापार के माहौल में और सरकार के साथ बातचीत करते समय पारदर्शिता स्थापित करना है

ई-गवर्नेंस के चरण

विभिन्न शोध अध्ययनों में यह स्पष्ट है कि ई-गवर्नेंस मौलिक रूप से कंप्यूटर प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर और संचार प्रणालियों की नेटवर्किंग के विकास से जुड़ा हुआ है। भारत में ई-गवर्नेंस की शुरुआत चार चरणों से हुई
  • कम्प्यूटरीकरण (Computerization): पहले चरण में, व्यक्तिगत कंप्यूटर की उपलब्धता के साथ सभी सरकारी कार्यालय में पर्सनल कंप्यूटर स्थापित किये गए| कंप्यूटर का उपयोग वर्ड प्रोसेसिंग के साथ शुरू हुआ, इसके बाद डेटा प्रोसेसिंग में तेजी आई।
  • नेटवर्किंग: इस चरण में, कुछ सरकारी संगठनों की कुछ इकाइयाँ को विभिन्न सरकारी संस्थाओं के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान और डेटा के प्रवाह के लिए एक हब के माध्यम से जोड़ा गया।
  • ऑन-लाइन उपस्थिति (On-line presence): तीसरे चरण में, इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ने के साथ, वेब पर उपस्थिति बनाए रखने के लिए एक आवश्यकता महसूस की गई। इसके परिणामस्वरूप सरकारी विभागों और अन्य संस्थाओं द्वारा वेबसाइटों का रखरखाव किया गया। आम तौर पर, इन वेब-पृष्ठों / वेब-साइटों में संगठनात्मक संरचना, संपर्क विवरण, रिपोर्ट और प्रकाशन, संबंधित सरकारी संस्थाओं के उद्देश्य और दृष्टि विवरण के बारे में जानकारी होती थी।
  • ऑनलाइन अन्तरक्रियाशीलता (Online interactivity): ऑन-लाइन उपस्थिति का एक स्वाभाविक महत्व सरकारी संस्थाओं और नागरिकों, नागरिक समाज संगठनों आदि के बीच संचार चैनलों का खोला जाना था। इस चरण का मुख्य उद्देश्य डाउनलोड करने योग्य फॉर्म प्रदान करके सरकारी संस्थाओं के साथ व्यक्तिगत इंटरफ़ेस के दायरे को कम करना था।
इसलिए ई-गवर्नेंस भारत के लिए एक उत्कृष्ट अवसर देता है ताकि शासन की गुणवत्ता में मौलिक सुधार हो सके और इस तरह
  • न केवल सेवा वितरण के लिए बल्कि नीतियों और सरकार के प्रदर्शन पर नागरिकों की राय प्राप्त करने के लिए सरकार और नागरिकों के बीच दो-तरफ़ा संचार की अनुमति दें।
  • बहिष्कृत समूहों तक अधिक पहुंच प्रदान करें, जिनके पास सरकार के साथ बातचीत करने और इसकी सेवाओं और योजनाओं से लाभ उठाने के कुछ अवसर हैं।
  • समाज के सभी वर्गों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करें।
  • आबादी के ग्रामीण और पारंपरिक रूप से हाशिए के क्षेत्रों को सक्षम करने के लिए अपने स्वयं के पड़ोस में सेवाओं के लिए तेजी से और सुविधाजनक पहुंच प्राप्त करें।

ई-गवर्नेंस के लाभ 


  • ई-गवर्नेंस शासन में सुधार है जो सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के संसाधन उपयोग द्वारा सक्षम है।
  • ई-गवर्नेंस सभी नागरिकों के लिए सूचना और उत्क्रिस्ट सेवाओं की बेहतर पहुंच बनाता है।
  • यह सरकार में सरलता, दक्षता और जवाबदेही भी लाता है।
  • आईसीटी के उपयोग के माध्यम से शासन को व्यापक व्यापार प्रक्रिया के साथ संयुक्त रूप से पुनर्व्यवस्थित करने से जटिल प्रक्रियाओं का सरलीकरण, संरचनाओं में सरलीकरण और विधियों और नियमों में बदलाव होगा।

(मल्टीमीडि) क्या हैं|


मल्टीमीडि) क्या हैं|





ल्टीमीडिया कई सारे तत्वों जैसे – टेक्स्ट, इमेज, आर्ट, साउण्ड, animation and video इत्यादि का समूह है। इन सभी तत्वों को किसी कंप्यूटर या किसी दूसरी इलैक्ट्राॅनिक डिवाइस के माध्यम से डिलीवर किया जाता है। मल्टीमीडिया आज के समय मे सूचना तथा प्रौद्योगिकी का अत्याधिक महत्वपूर्ण तथा लोकप्रिय क्षेत्र है। मल्टीमीडिया दो शब्दों से मिलकर बना है। मल्टी़मीडिया में मल्टी का अर्थ है बहुत सारे तथा मीडिया का अर्थ है पैकेज या elements जैसेः टैक्स्ट, इमेज, ऑडियो, वीडियो, एनीमेशन आदि


मल्टीमीडिया सिस्टम

मल्टीमीडिया सिस्टम मल्टीमीडिया डेटा और एप्लिकेशन को संसाधित करने में सक्षम प्रणाली है। मल्टीमीडिया सिस्टम वह है जो मल्टीमीडिया सूचना के प्रसंस्करण (Processing), भंडारण (Storage), उत्पादन (generation), तथा हेरफेर (manipulation) कर सके|

मल्टीमीडिया सिस्टम के लक्षण

एक मल्टीमीडिया प्रणाली में चार बुनियादी विशेषताएं हैं:
  • मल्टीमीडिया सिस्टम को कंप्यूटर नियंत्रित होना चाहिए।
  • मल्टीमीडिया सिस्टम एक एकीकृत सिस्टम होता है मतलब प्रसंस्करण (Processing), भंडारण (Storage), उत्पादन (generation), तथा हेरफेर (manipulation) एक ही सिस्टम से पुरे किया जा सकें|
  • मल्टीमीडिया सिस्टम द्वारा प्रयोग जानकारी को डिजिटल रूप से दर्शाया जाना चाहिए।
  • मीडिया की अंतिम प्रस्तुति के लिए इंटरफ़ेस आमतौर पर इंटरैक्टिव होता है।

एक मल्टीमीडिया सिस्टम के घटक

कैप्चर करने वाले उपकरण (Capture Devices)
– वीडियो कैमरा, वीडियो रिकॉर्डर, ऑडियो माइक्रोफोन, कीबोर्ड, माउस, 3 डी इनपुट डिवाइस, स्पर्श सेंसर, वीआर डिवाइस। डिजीटलिंग / सैम्पलिंग हार्डवेयर
भंडारण उपकरण (Storage Devices)
– हार्ड डिस्क, सीडी-रोम, डीवीडी, आदि
संचार नेटवर्क (Communication Networks)
– इथरनेट, टोकन रिंग, एफडीडीआई, एटीएम, इंट्रानेट, इंटरनेट्स।
कंप्यूटर सिस्टम (Computer Systems)
– मल्टीमीडिया डेस्कटॉप मशीन, वर्कस्टेशन, एमपीईजी / वीडियो / डीएसपी हार्डवेयर
आउटपुट डिवाइस (Display Devices)
– सीडी-क्वालिटी स्पीकर, एचडीटीवी, एसवीजीए, हाय-रेस मॉनिटर, कलर प्रिंटर आदि

Wednesday, 11 March 2020

वर्चुअल रियालिटी क्या हैं | students for DCA AND PG

र्चुअल रियालिटी एक कम्प्यूटर सिस्टम हैं जिसका प्रयोग एक काल्पनिक दुनिया को क्रिएट करने के लिये किया जाता है
virtual reality 
   का प्रयोग अक्सर 3D वातावरण उच्च विजुअल मल्टीमीडिया इत्यादि से संबंधित एप्लीकेशन्स के लिये किया जाता है। वर्चुअल रियालिटी आपको कम्प्यूटर के द्वारा जनरेट की गयी दुनिया मे होने का यह एहसास कराती है। जैसे-हम कम्प्यूटर पर कार रेस गेम खेलते है। तो हम उस खेल मे इस तरह समाहित हो जाते है, कि हमे ऐसा लगता है कि हम वास्तविक रूप से ही कार को ड्राइव कर रहे है। लेकिन actually मे ऐसा नही होता है

virtual reality को स्पष्ट रूप से समझने के लिये हम मूवी का उदाहरण लेते है। जब हम मूवी थियेटर मे मूवी देख रहे होते है। तो हमारे सामने जेा घटना घट रही होती है। उसे देखकर हमे लगता है, कि जो कुछ भी सामने हो रहा है, वह actually मे हो रहा है, जबकि वह घटना काल्पनिक है। इस तरह हम virtual reality को संक्षिप्त रूप से इस तरह परिभाषित कर सकते है। कि virtual reality एक ऐसा concept है जो हमे किसी घटना के actually मे होना या आभास कराता है, लेकिन वास्तव मे ऐसा नही होता है। कि ये जो कुछ भी घट रहा है। वह Actually मे क्रियान्वित हो रहा है

वर्चुअल रियालिटी का इतिहास _              pankaj sir 

वर्चुअल रियालिटी शब्द वर्ष 1987 मे जेरान लेलियर ने बनाया था जिसकी अनुसंधान और इंजीनियरिंग ने नये विकास उद्योग मे अनेक उत्पादो को योगदान दिया है। अमेरिकी सरकार और विशेेषकर उसका रक्षा विभाग नेशनल साइन्स फाउन्डेशन तथा नेशानल एरोनटिक्स एण्ड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) द्वारा विश्वविद्यालय में स्थित प्रयोगशालाओं को अनुसंधान हेतु वित्तीय अनुदान मिला और इसके परिणमस्वरूप इस क्षेत्र में निपुण व्यक्तियों को विशिष्ट क्षेत्रों में विशेषज्ञ बना कर तैयार किया ये क्षेत्र कम्प्यूटर ग्राफिक्स सिमुलेंशन तथा नेटवर्क से बने वातावरण तथा शैक्षिक, सेना तथा काॅमर्शियल काम के बीच सम्पर्क इत्यादि है। वर्चुअल रियालिटी के बारे में सन् 1965 के आसपास विचार किया गया था जब Ivan Sutherland ने वर्चुअल अथवा इमेजनरी संसार के निर्माण के लिये अपने सुझाव प्रस्तुत किए थे। 1969 ये उसने पहले ऐसे सिस्टम का निर्माण किया जो लोगों को सूचना के थ्री-डामेन्शनल डिस्प्ले में बाॅधता था 1970 तथा 1980 के मध्य में वर्चुअल रियलिटी की अवधारणा का मुख्य उपयोग United States ने किया था 
सन् 1962 में Ivan Sutherland ने एक light pen का विकास किया जिसके द्वारा कम्प्यूटर पर तस्वीरें स्केच की जा सकती थी। 1970 तक Sutherland ने कम्प्यूटर ग्राफिक्स में Scientific Visualization का उपयोग डाटा के Columns को तस्वीरों में परिवर्तित करने के लिए भी किया गया था। Scientific Visualization के उद्देश्य अपनी तस्वीरों में सिस्टम्स अथवा प्रोसेस की डाइनेमिक विशेेषताओं को कैप्चर करना था। 1980 में Scientific Visualization, Hollywood की कई स्पेशल इफैक्ट वाली विधियों को निर्माण तथा Borrowing एनीमेशन की तरह चला गया 1990 में NCSA अवार्ड विनिंग Smog एनीमेशन जो Los Angeles पर Descend कर रही थी ने State में Antipollution Legislature को प्रभावित किया वैज्ञानिकों को इन्ट्र्क्टिविटी चाहिए थी तथा मिलेटरी इंडस्ट्री, बिजनैस तथा मनोरंजन की परस्पर सबन्धों की आवश्यकता थी

डिस्ट्रिब्यूटेड सिस्टम क्या हैं (2 sem )

डिस्ट्रिब्यूटेड सिस्टम क्या हैं  


panakj sir 

ब अनेक Autonomous (स्वतंत्र) कंप्यूटर को जोड़कर एक सिंगल सिस्टम की तरह प्रयोग किया जाता हैं उसे डिस्ट्रिब्यूटेड सिस्टम कहते हैं जरुरी नहीं की सारे कंप्यूटर एक ही जगह पर कनेक्ट हो वह अलग अलग जगह पर भी कनेक्ट हो सकते हैं यदि सभी कंप्यूटर एक ही जगह पर कनेक्ट हैं तो इसे LAN Distributed System कहेगें और यदि सभी कंप्यूटर अलग अलग जगह पर कनेक्ट हैं तो इसे WAN Distributed System कहा जायेगा|



Distributed System के लिए तीन चीजो की आवश्यकता होती हैं –

  1. Network
  2. Distributed Application
  3. Middle ware Service (Software)

डिस्ट्रिब्यूटेड सिस्टम Autonomous कम्प्यूटर के कलेक्शन से मिलकर बना है। यह सिस्टम एक नेटवर्क तथा Distribution Middle ware के माध्यम से जुड़ा होता है। जो कम्प्यूटरों को इनकी गतिविधियों के साथ समन्वित (coordinate) करने के लिऐ सक्षम बनाता है। तथा सिस्टम के संसाधनों को Share करता है। ताकि User System को एक Single Integrating कम्प्यूटिंग सुविधा के रूप में प्राप्त करें।
एक डिस्ट्रिब्यूटेड कम्प्यूटर सिस्टम बहुत से Software components से मिलकर बना होता हैं । जो मल्टीपल कम्प्यूटर पर होते है, लेकिन एक Single System के रूप में रन होते है। जो कम्प्यूटर्स एक डिस्ट्रिब्यूटेड  सिस्टम में होते है, वो आपस में एक दूसरें से Physically Close हो सकते है, तथा एक Local Network के द्वारा Connect होते है। या फिर ये Wide area Network के द्वारा Connect होते है। एक डिस्ट्रिब्यूटेड  सिस्टम मेनफ्रेम, पर्सनल कम्प्यूटर्स वर्कस्टेशन्स इत्यादि के रूप में कई तरह के Configuration से मिलकर बने हो सकते है। Distributed Computing का लक्ष्य एक Single Computer के रूप में कार्य करने वाले Network को बनाना है।
Distributed System, Client Server Architecture प्रणाली पर आधारित होता हैं –
डिस्ट्रिब्यूटेड सिस्टम पर सॉफ्टवेयर को रन करने का एक सामान्य तरीका फंक्शन्स को Clients and Servers को दो भागों में अलग-अलग करना है। एक क्लाइंट एक प्रोग्राम है जो उन सर्विस को प्रयोग करता है। जिन्हें दूसरे प्रोगामों के द्वारा उपलब्ध कराया जाता है। जो प्रोंग्राम्स सर्विस को उपलब्ध कराते है। उन्हें Servers कहते है। Client एक सर्विस के लिए रिक्वेस्ट एक सर्विस के लिए रिक्वेस्ट करता है तथा सर्वर इस रिक्वेस्ट को परॅफाॅर्म करता है
Clients and Server System का सामान्य Design three tiers का प्रयोग करता है-
1. एक क्लांइट जो यूजर के साथ Interact करता है।
2. एक एप्लीकेशन सर्वर जो एप्लीकेशन के बिजनेस लाॅजिक को रखता है।
3. रिसोर्स मैनेजर जो डाटा को स्टोंर करता है।
निम्नलिखित चित्र में Three-tier Client and Server आर्किटेक्चर को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया गया है-
एक डिस्ट्रिब्यूटेड  सिस्टम स्वतन्त्र कम्प्यूटर्स का एक कलेक्शन है जो एक Single टास्क के लिए सम्मिलित रूप में प्रयोग किया जाता है। या एक Single Service को उपलब्ध कराता है।
thankyou

नेट बैंकिंग क्या इसकी पूरी जानकारी हिंदी मे

 नेट बैंकिंग क्या इसकी पूरी जानकारी हिंदी मे



यह अब हम आपको बताएंगे सुविधा आप किसी भी बैंक से ले सकते हैं |यानी कि जिस बैंक में आपका खाता है |बैंक में आप अपनी नेट बैंकिंग एक्टिवेट करवा कर नेट बैंकिंग की पूरी सुविधा ले सकते हैं |नेट बैंकिंग एक ऐसा जरिया है जिसके लिए आपको बैंक जाने की जरूरत नहीं है |आप कोई भी काम बैंक का करना चाहते हैं जैसे कि किसी को कितने हैं पैसे भेजने हैं या फिर किसी के पैसे आपके पास आने हैं |आपका कितना बैलेंस है कोई भी रिचार्ज करना है |घर बैठे आसानी नेट बैंकिंग की सहायता से आप कर सकते हैं या आप कोई भी शॉपिंग करना चाहते हैं यह सब कुछ नेट बैंकिंग की सहायता से घर बैठे आसानी से हो जाएगा| परंतु अब आप सोच रहे होंगे हम नेट बैंकिंग का इस्तेमाल किस प्रकार से करेंगे ?तो दोस्तों घबराने की जरूरत नहीं है |हम आपको अपने आर्टिकल में नेट बैंकिंग किस प्रकार से इ इस्तेमाल करेंगे इसकी भी पूरी जानकारी देंगे

दोस्तों अब हम आपको बताएंगे नेट बैंकिंग के क्या क्या लाभ हैं
  • दोस्तों हम आपको बताना चाहेंगे नेट बैंकिंग एक बहुत ही अच्छी टेक्नोलॉजी है जिसके लिए हमें बार-बार बैंकों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे |
  • हमें बैंकों की लाइन में नहीं खड़ा होना पड़ेगा |
  • हम अपने बैंक की जो भी जानकारी चाहते हैं हमें सब नेट बैंकिंग की सहायता से मिल जाएगी|
  • हम अपने बैंक कितना लेनदेन कर रहे हैं जो भी पासबुक में ब्योरा होता है वह सारा आपका नेट बैंकिंग पर आ जाएगा |
  • आसानी पूर्वक घर बैठे देख सकते हैं |
  • आपको कहीं पर भी शॉपिंग करनी है आपको पेमेंट करनी है तो आप नेट बैंकिंग की सहायता से कर सकते हैं|
  •  Net banking की मदद से हम बहुत प्रकार का खाता खोल सकते हैं जैसे FD( fixed deposit), RD (recurring deposit) etc. सबसे अच्छी बात ये है की इस तरह के खातों में पैसे deposit करने के लिए भी हमें bank जाने की जरुरत नहीं पड़ती क्यूंकि net banking हमें auto cut payment की सुविधा देती है जिसके जरिये हमारे account से balance अपने आप ही cut हो कर इन खातों में deposit हो जाती है
दोस्तों अब आपको पता चल चुका है कि नेट बैंकिंग के कितने लाभ हैं अब आप सभी सोच रहे होंगे कि हमारे पास भी नेट बैंकिंग होनी चाहिए| तो जल्दी कीजिए जहां पर भी आपका बैंक अकाउंट है वहां पर जाइए नेट बैंकिंग को एक्टिवेट करवाइए बैंक वाले आपको यूजर नेम और पासवर्ड देंगे और नेट बैंकिंग की आपको आपके मोबाइल फोन पर इंस्टॉल कर देंगे बस फिर बहुत ही आसान है अपना मोबाइल उठाइए अपना यूजर नेम और पासवर्ड डालिए नेट बैंकिंग को इस्तेमाल कीजिए पर बैठकर इंटरनेट बैंकिंग का पूरा लाभ उठाइए और बैंकों के चक्कर काटने से बचिए

इंटरनेट बैंकिंग करते वक़्त कौन सी बातों का ध्यान रखें?

  1. Net banking का इस्तेमाल कभी भी public places जैसे cyber cafe में न करें इससे आपके details leak होने के chances रहते हैं|
  2. अपने password को change करते रहे ताकि आपके account के hack होने का डर न रहे|
  3.  एक unique password रखें जिससे आपका account पूरी तरह से सुरक्षित रहे|
  4. हमेसा अकेले में ही net banking का इस्तेमाल करिए |
  5. अपने password किसी भी दुसरे व्यक्ति के साथ share ना करें|
  6. एक बात का ध्यान जरुर रखें की जिस device से आप net banking कर रहे हैं |
  7. उस device में एक अच्छा anti-virus जरुर install कर लें |
  8. Net banking करते वक़्त आपको कोई भी परेशानी हो या आपको किसी भी तरह का शक हो तो तुरंत अपने bank के branch में संपर्क करें
दोस्तों आपने बैंक में जाकर अपना नेट बैंकिंग इंस्टॉल करवा लिया है और आपके पास यदि यूजर नेम और पासवर्ड आ चुका है तो आप नेट बैंकिंग का इस्तेमाल कर सकते हैं दोस्तों हम आपको बता दें नेट बैंकिंग हरेक बैंक की हो सकती है {उदाहरण के लिए अभी हम आपको बताएंगे यदि आपने SBI की नेट बैंकिंग ले रखी है और आपके पास अपनी नेट बैंकिंग का यूजर नेम और पासवर्ड है तो आप किस प्रकार से अपनी नेट बैंकिंग को इस्तेमाल करेंगे की जानकारी हम आपको देंगे|}
    
           नेट  बैंकिंग को इस्तमाल केसे करे 
  • दोस्तों यदि आप नेट बैंकिंग को अपने मोबाइल फोन पर इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपके पास नेट बैंकिंग की एप्लीकेशन इंस्टॉल होगी |
  • उस एप्लीकेशन को ओपन करें|



  • एप्लीकेशन को ओपन करने के बाद आपसे वह यूजर नेम और पासवर्ड पूछा जाएगा
  • और फिर लॉगइन का ऑप्शन आएगा आप यूजर नेम और पासवर्ड को भर दे |


  • और लॉगइन बटन पर क्लिक करें |
  • जैसे ही आप ऐसा करेंगे |
  • आपकी नेट बैंकिंग ओपन हो जाएगी| |
  • अब आप के पास बहुत सारे ऑप्शन आएंगे जैसे कि  my account,fund transfer, e-deposits, top up recharge,bill payments,upi,quick transfer !!!!!!!!!!



  • my account एप्लीकेशन पर क्लिक करके आप अपना पूरा बैलेंस चेक कर सकते हैं 




  • कि आपके पास पासबुक में अमाउंट है और कितना अमाउंट आपने किसी को भेजा है जैसा की आप की पासबुक में डिटेल आती है वैसे ही डिटेल आपकी माय अकाउंट ऐप में आ जाएगी|
  • quick transfer -एप्लीकेशन से आप कहीं पर भी जिसको भी आप अमाउंट भेजना चाहते हैं उसका अकाउंट नंबर डालकर उसको आप पैसे भेज सकते हैं|
  • bill payments-इंटरनेट बैंकिंग की सहायता से आप कहीं पर भी बिल पेमेंट कर सकते हो

Tuesday, 10 March 2020

एंड्राइड क्या हे पूरी जानकारी हिंदी में

एंड्राइड  क्या है? (What is Android)

सबसे पहले आपका यह जानना आवश्यक है की एंड्राइड कोई मोबाइल फ़ोन नहीं बल्कि एक ऑपरेटिंग सिस्टम है जो गूगल के द्वारा डेवलप किया गया है। एंड्राइड  ऑपरेटिंग सिस्टम लिनक्स कर्नल पर आधारित ऑपरेटिंग सिस्टम है या इसे यह भी कह सकते हैं की यह लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम का ही एक रूप या वर्जन है जो लिनक्स को कस्टमाइज करके बनाया गया है
एंड्राइड के बारे में विस्तार से जाने लिनक्स जो की एक ओपन सोर्स और फ्री ऑपरेटिंग सिस्टम है इसी के मुख्य भाग जिसे कर्नल कहते हैं उसे इस्तेमाल करके एंड्राइड  ऑपरेटिंग सिस्टम बनाया गया है। एंड्राइड  को मुख्य रूप से मोबाइल डिवाइस को ध्यान में रखकर बनाया गया है जिससे हम अपने मोबाइल में ही अपने कंप्यूटर की तरह ही कई सारे काम कर पाएं। जिस तरह से डेस्कटॉप या लैपटॉप कंप्यूटर में हम ज्यादातर विंडोज इस्तेमाल करते हैं उसी तरह मोबाइल के लिए एंड्राइड  आता है और मोबाइल में सबसे ज्यादा इसी का इस्तेमाल किया जाता है। एंड्राइड शुरूआत में सिर्फ मोबाइल के लिए ही लांच किया गया था लेकिन जैसे जैसे इसका मार्केट बढता गया वैसे-वैसे गूगल ने बाकी डिवाइस जैसे TV, SmartWatch आदि पर भी एंड्राइड  को लांच करना शुरू कर दिया| एंड्राइड  ऑपरेटिंग सिस्टम की ख़ास बात यह है की यह एक फ्री और ओपन सोर्स ऑपरेटिंग सिस्टम है यानी इसके लिए हमें अलग से पैसे देने नहीं पड़ते यह हमारे मोबाइल के साथ ही आता है और इसका सोर्स कोड कोई भी देख सकता है

एंड्राइड ऑपरेटिंग सिस्टम का इतिहास)

एंड्राइड  को सबसे पहले November 2007 में Android Inc. द्वारा लांच किया गया था। Android Inc. की शुरुआत Andy Rubin के द्वारा 2003 में की गयी थी| जिसे सन 2005 में गूगल के द्वारा खरीद लिया गया था और Andy Rubin को ही एंड्राइड का हेड बनाया गया था क्यूंकि गूगल को Andy rubin का विचार बहुत अच्छा लगा तो उन्होंने उसी विचार को रखा और आगे तक चलने दिया हालाँकि एंड्राइड  के लोकप्रिय होने के बाद सन 2013 में Andy Rubin ने गूगल को अपने किसी प्रोजेक्ट के लिए छोड़ दिया था लेकिन इनके जाने के बाद सन 2013 में सुन्दर पिचई को एंड्राइड  का हेड नियुक्त किया गया और इन्होने भी एंड्राइड को आगे तक ले जाने में अपना काफी योगदान दिया।

एंड्राइड वर्शन सिस्टम का इतिहास (Android version history)

आप सभी ने Android Lollipop, Android Kitikat, Android Naugat आदि यह सभी नाम सुने ही होंगे अगर आप नहीं जानते की यह क्या हैं तो आपको बता दूं की ये सभी एंड्राइड  के अलग-अलग वर्ज़न है जो अलग-अलग टाइम पर नए-नए फीचर और सुधार के साथ लांच हुए थे इनके अलावा भी एंड्राइड  के कई सारे वर्ज़न है जिनके लांच होने के साथ-साथ हमें एंड्राइड  में कई सारे बदलाव और सुधार देखने को मिले। यहाँ एंड्राइड  के सभी वर्ज़न की लिस्ट दी गयी है।
  • Android Alpha (1.0)
  • Android beta (1.1)
  • Android Cupcake (1.5)
  • Android Donut (1.6)
  • Android Eclair (2.0, 2.1)
  • Android Froyo (2.2)
  • Android Gingerbread (2.3)
  • Android Honeycomb (3.0, 3.1, 3.2)
  • Android Ice Cream Sandwich (4.0)
  • Android Jellybean (4.1, 4.2, 4.3)
  • Android Kitkat (4.4)
  • Android Lollipop (5.0, 5.1)
  • Android Marshmallow (6.0)
  • Android Nougat (7.0, 7.1)
  • Android Oreo (8.0, 8.1)
जैसा की आप ऊपर देख सकते हैं की गूगल एंड्राइड के हर वर्ज़न को एक ख़ास नाम देता है जो किसी मिठाई के नाम पर होता है, और गूगल सारे नाम एक अल्फाबेटिकल आर्डर में देता है। आइये इन सभी वर्ज़न के बारे में जानते हैं)|
Android 1.0 alpha
Android 1.0 alpha एंड्राइड का पहला वर्ज़न था यह November 2007 में लांच किया गया था और 23 September 2008 में HTC के मोबाइल HTC Dream के साथ व्यावसायिक रूप से लाया गया था।
Android 1.1
एंड्राइड  के इस वर्ज़न  में आपको message attachment save करने और long in-call screen off, time out जैसे फीचर दिए गए थे इस वर्ज़न  को फरवरी 2009 में लांच किया गया था।
Android 1.5
एंड्राइड  के इसी वर्ज़न  में कई सारे वर्ज़न  जोड़े  गए और एंड्राइड  वर्ज़न की चॉकलेट और मिठाई पर नाम होने की सीरीज यही से शुरू हुई। इस वर्ज़न  में हमें कई सारे फीचर देखने को मिलें जैसे यूट्यूब पर विडियो अपलोड करने के लिए, और पिकासा पर फोटो अपलोड करने के लिए आप्शन आदि। साथ ही इस वर्ज़न में एक और नया कॉन्सेप्ट सामने आया animated wallpapers का जिन्हें हम live wallpaper भी कहते हैं।
Android 1.6
इसमें हमें कई नयी चीज़ें जैसे Gallery, Camcorder आदि फीचर देखने को मिले और साथ ही कई सारे हार्डवेयर का सपोर्ट देखने को मिला | जैसे WVGA स्क्रीन resolution और better camera resolution आदि | इसे September 2009 लांच किया गया था।
Android  2.0, 2.1
इसमें नए Bluetooth 2.1 का सपोर्ट और माइक्रोसॉफ्ट एक्सचेंज का सपोर्ट आया और साथ ही ब्राउज़र में HTML 5 का सपोर्ट भी जोड़ा गया जिससे की यह आने वाले टाइम की वेबसाइट या वेब ऐप्स को आसानी से चला सके इसके अलावा भी इसमें कई फीचर जोड़े गए थे | इसे 26 अक्टूबर 2009 में लांच किया गया था।
Android  2.2
इसमें ब्राउज़र में कुछ सुधार किये गए और इसके अलावा क्रोम ब्राउज़र में क्रोम के V8 javascript सपोर्ट इंजन को जोड़ा गया जिससे वेबसाइट और भी ऑप्टीमाइज़्ड तरीके से लोड होती थी। इसके अलावा USB tethering और WIFI hotspot के सपोर्ट को भी जोड़ा गया ।
Android  2.3
इसको तो शायद आपने भी देखा होगा क्यूंकि यह वर्ज़न  इंडिया में काफी लोकप्रिय  हुआ था और कई बड़ी कंपनीयों ने इसी वर्ज़न  के आने के बाद भारत में मोबाइल की शुरुआत की थी इस की सबसे ख़ास बात यह थी की इसमें extra-large यानी WXGA displays का सपोर्ट जोड़ दिया गया था | और इसके अलावा यह बाकी वर्ज़न के मुकाबले काफी तेज़ था इसमें कई सारे सॉफ्टवेयर सुधार और हार्डवेयर सपोर्ट के साथ-साथ कई सारे मल्टीमीडिया सपोर्ट भी जोड़ा गया  | इस वर्ज़न  को 6 दिसम्बर 2010 में लांच किया गया था।
Android 3.0, 3.1, 3.2
Android honeycomb को खासकर टेबलेट डिवाइस को ध्यान में रखकर बनाया गया था इसीलिए यह हमें मोबाइल में ज्यादातर देखने को नहीं मिला लेकिन इसमें इसके अलावा भी कई सारे परिवर्तन थे जैसे नेटिव UI का सपोर्ट Hardware acceleration और Navigation key आदि का सपोर्ट भी दिया गया था। इसी वर्ज़न में मल्टीकोर प्रोसेसर के लिए भी सपोर्ट जोड़ा गया था। इसे 10 मई 2011 में लांच किया गया था।
Android  4.0
इस वर्ज़न  में भी काफी सारे  परिवर्तन देखने को मिले जैसे इसमें फ़ोन के लिए नयी Holo Theme को introduce कराया गया,और इसके अलावा इसमें Facial recognition software को भी introduce कराया गया जिससे आप अपने Face से अपने device को अनलॉक कर सकते थे। इसके अलावा इसमें onscreen Navigation buttons को भी जोड़ा  गया था। इसे 18 अक्टूबर 2011 में लांच किया गया था।
Android 4.1, 4.2, 4.3
एंड्राइड  के इस version में enhanced graphics के साथ-साथ काफी नयी चीज़ें देखने को मिली | जैसे- boosted CPU परफॉरमेंस enhanced accebility और भी कई चीज़े यह वर्ज़न  9 july 2012 को रिलीज़ किये गया था।
Android  4.4
एंड्राइड  KitKat से एंड्राइड  ऑपरेटिंग सिस्टम में का बदलाव देखने को जैसे Wireless Printing, Bluetooth MAP ( Massage Access Profile) support, New Refreshed User Interface and verified boot और साथ-ही-साथ इसमें developers के लिए भी बहुत सारे बदलाव किये गए जैसे Screen Recording through ADB, और नया API आदि। Android Kitkat को 31 October 2013 में लांच किया गया था।
Android 5.0 and 5.1
साल 2014 एंड्राइड के बहुत ही ख़ास वर्ष था क्यूंकि इसमें एंड्राइड के बहुत ही ख़ास Update 5.0 और 5.1 release हुए थे इनमे अपडेट में बहुत ही ख़ास बात यह थी की इनमे एंड्राइड के UI का बहुत ही ख़ास Design Material Design introduce हुआ था यह वही डिजाईन है जो अभी नए Updates में भी देखने को मिलता है इस डिजाईन ने एंड्राइड  का पूरा इंटरफ़ेस बदल दिया था। इसके अलावा भी इसमें कई फीचर ऐड किये गए थे जैसे Updated Emoji और smart lock। एंड्राइड  5.0 lollipop 12 November 2014 में introduce हुआ था।
Android  6.0
यह वर्ज़न  भी अपने आप में कई changes लेकर सामने आया था जैसे Fingerprint scanner support, Doze mode, USB-C सपोर्ट और इसके अलावा और भी कई सारे। यह वर्ज़न  साल 2015 में अक्टूबर के महीने में रिलीज़ किया गया था।
Android 7.0 और 7.1
ये अपडेट 2016 में Pixel Phones के साथ लांच हुए थे और इनमे कई सारे फीचर introduce हुए जैसे Google Daydream VR का support, improved Doze Mode, Google assistance, Ability to screen zoom, Data saver mode, Improved File browser, Unicode 9.0 emoji का support और Quick settings आप्शन। यह तो बस एक overview है इसके अलावा भी इसमें कई सारे फीचर जोड़े गए थे। Andriod Naugat 22 August 2016 में introduce किया गया था।
Android 8.0, 8.1
एंड्राइड  8.0 और 8.1 Oreo एंड्राइड  के अभी हाल ही में आए सबसे latest versions है जिनमे हमें काफी कुछ नया देखने को मिला है इसमें जोड़े गए कुछ ख़ास फीचर इस प्रकार है-
  • Picture-in-picture support
  • Multi-Display support
  • Google-play protect
  • Faster boot time
  • Unicode 10 support
  • Wifi assitant
यह कुछ ख़ास फीचर है एंड्राइड  8.0 के इसके अलावा भी इस में कई सारे फीचर हैं जिन्हें आप चाहे तो google developer पेज पर या Wikipedia पर देख सकते हैं।

Monday, 9 March 2020

linux कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम क्या हे हिंदी में


                     
             PANKAJ SIR 

क्या आपको पता है आपके स्मार्टफोन, कंप्यूटर तथा घर में इस्तेमाल होने वाले अनेक उपकरणों में Linux का इस्तेमाल होता है!
अब यदि आप सोच रहे हैं की आखिर Linux क्या है? हमारे गैजेट्स में Linux किस तरह कार्य करता है? तो आपको दिमाग पर ज्यादा जोर देने की कोई जरूरत नहीं हैं|
किसी भी कंप्यूटर मशीन को चालू करने पर सॉफ्टवेयर के रूप में सबसे पहला कार्य ऑपरेटिंग सिस्टम का होता है. ऑपरेटिंग सिस्टम स्वयं कंप्यूटर मेमोरी में लोड होने के बाद कंप्यूटर में उपलब्ध सूचनाओं तथा डेटा के आधार पर मैनेज कर आगे निर्देश देता है.
Unix ऑपरेटिंग सिस्टम का एक प्रकार Linux OS है. जिस प्रकार Windows तथा Mac ऑपरेटिंग सिस्टम होते हैं.  उसी प्रकार Linux भी एक ऑपरेटिंग सिस्टम है. यह एक फ्री तथा ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर है. जिसका मतलब है एक यूजर इंटरनेट पर मुफ्त में लिंक्स कोडिंग को मॉडिफाई कर कमर्शियल तथा निजी उपयोग में ले सकता है. इसमें वे सॉफ्टवेयर होते हैं जो Linux Kernel पर आधारित हैं.
लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम को वास्तविक रूप से पर्सनल कंप्यूटर के लिए विकसित किया गया था. लेकिन बाद में इस ऑपरेटिंग सिस्टम ने अनेक प्लेटफॉर्म मोबाइल, स्मार्ट टीवी, गेमिंग कंसोल यहाँ तक वाहनों में भी इसी ओपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है.
लिनक्स यूनिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम की तरह ही मिलता-जुलता ओपरेटिंग सिस्टम है. इसके साथ ही इसका इस्तेमाल सर्वर तथा कंप्यूटर सिस्टम (मैनफ्रेम कम्प्युटर) डिवाइस में सबसे अधिक होता है.
आंकड़ों के अनुसार लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम एक मात्र OS है जिसे टॉप 500 सुपर कंप्यूटर में इस्तेमाल किया गया. कुल डेस्कटॉप कंप्यूटर के 2% से अधिक सिस्टम में लिनक्स का इस्तेमाल किया जाता है. यहाँ तक कि क्रोमबुक जिसका नाम शायद आपने जरूर सुन होगा. यह भी लिनक्स ओपरेटिंग सिस्टम पर कार्य करता है   
History of linux in hindi  
ऑपरेटिंग सिस्टम की शुरूआत वर्ष 1991 में हुई उस समय Linux Torvalds  नामक छात्र ने अपने पर्सनल प्रोजेक्ट में फ्री ऑपरेटिंग सिस्टम Kernel  को तैयार किया. और Linux Kernel तब से लेकर अब तक निरंतर विकसित होता गया.
रोचक बात यह है कि उस समय उन्होंने इस प्रोग्राम को अपने कंप्यूटर के लिए तैयार किया था. और वह Unix 386 Intel कंप्यूटर खरीदना चाहते थे. लेकिन Linux अपनी आर्थिक स्थति के कारण उस कंप्यूटर को खरीदने में असमर्थ थे. इस तरह उनके द्वारा एक छोटे से प्रोग्राम ने विश्व के समक्ष Linux kernel को पेश किया.
उस दौरान कंप्यूटर्स काफी बड़े साइज के होते थे तथा उनके ऑपरेटिंग सिस्टम भी भिन्न प्रकार के होते थे. आप समझ सकते हैं कि उन्हें ऑपरेट करना कितना मुश्किल होता होगा. इसके साथ ही प्रत्येक सॉफ्टवेयर को अलग-अलग उद्देश्य से तैयार किया जाता था तथा उस सॉफ्टवेयर को प्रत्येक कंप्यूटर पर उपयोग करना संभव नहीं था

विंडोस और लिनक्स में अंतर 
  • Windows में C, D, E ड्राइव जिनमें अनेक फोल्डर होते हैं परंतु दूसरी ओर लिनक्स में कोई ड्राइव नहीं होती.
  • विंडोज सिस्टम में हम किसी फोल्डर में एक नाम से दो फ़ाइल को स्टोर नहीं कर सकते बल्कि Linux ऑपरेटिंग सिस्टम में 2 फाइल को एक फोल्डर में सेव किया जा सकता है.
  • Windows ऑपरेटिंग सिस्टम में Guest, Standard, Administrator समेत कुल तीन एकाउंट होते हैं जबकि दूसरी तरफ रेगुलर, रुट तथा सर्विस एकाउंट Linux सिस्टम के एकाउंट टाइप है.
  • Linux सिस्टम में ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर कार्य करते हैं, जबकि विंडॉज में Closed Source सॉफ्टवेयर कार्य करते हैं.
  • Windows ऑपरेटिंग सिस्टम सिंगल-यूजर के लिए होता है जबकि Linux सिस्टम मल्टि-यूजर होता है.
  • Linux ऑपरेटिंग सिस्टम को Windows की तुलना में अधिक सुरक्षित OS माना जाता हैं क्योंकि इनमें वायरस हमले के अवसर निम्न होते हैं.
  • हालाँकि विंडॉज सिस्टम के सरलतम उपयोग तथा अधिक फ़ीचर्स के कारण अधिकतर यूज़र्स विंडॉज ओपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं|



linux ऑपरेटिंग सिस्टम की विशेषताएँ


  • सबसे महत्वपूर्ण बात यह जानना है कि Linux ऑपरेटिंग सिस्टम लगभग सभी विंडॉज की तुलना में यह वायरस से मुक्त होता है. स्पाइवेयर, ट्रॉजन, एडवेयर आदि वायरस अटैक लिनक्स ऑएस में समान्यतः नहीं होते. जिस वजह से इसे सबसे अधिक सुरक्षित ऑपरेटिंग सिस्टम माना जाता है.
  • विंडॉज ऑपरेटिंग सिस्टम के मुक़ाबले Linux मुफ्त तथा काफी सस्ते होते हैं. Linux के Variants तथा वर्जन कई महीनों, सालों तक ‘रीबूट’ किये बिना चल सकते हैं
  • लिनक्स ओएस में अधिकतर गेम्स फ्री या ओपन सोर्स होते हैं. ओपन ऑफिस, स्टार ऑफिस जैसे प्रोग्राम लिनक्स ओएस में फ्री होते हैं.
  • चूँकि अधिकतर Linux प्रोग्राम तथा वैरिएंट्स ओपन सोर्स होते हैं जिस वजह से यूज़र आवश्यकतानुसार कोडिंग कर सकता है.
  • लिनक्स ओएस का इस्तेमाल घरों, विद्यालयों तथा विभिन्न कंपनियों में होता है. क्योंकि हमेशा से ही Linux को सबसे सुरक्षित ऑपरेटिंग सिस्टम माना गया है|



linux ऑपरेटिंग सिस्टम  के दोष 

  • हालांकि लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम ओपन सोर्स होने के कारण यूजर अपने अनुसार कस्टमाइज कर सकता है. परंतु आज भी नॉन टेक्निकल व्यक्ति के लिए लिनक्स का इस्तेमाल करना विंडोज से कहीं ज्यादा कठिन होता है.
  • लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम में काफी बड़ी मात्रा में सॉफ्टवेयर प्रोग्राम पाए जाते हैं परंतु विंडोज की तुलना में प्रोग्राम इंस्टॉलेशन करना कठिन होता है.
  • यहां आप को समझना होगा कि विंडोज की तुलना में लिनेक्स ने मार्केट में कम लोकप्रियता हासिल की जिस वजह से आपको मन मुताबिक प्रोग्राम आमतौर पर देखने को नहीं मिलते. आमतौर पर देखा गया है कि लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम में प्रिंटर तथा ब्लू रे डिस्क को कनेक्ट करना आसान नहीं रहता.
  • लिनक्स विंडोज तथा मेक ऑपरेटिंग सिस्टम की तरह इस्तेमाल करना आसान नहीं रहता क्योंकि इसमें टेक्निकल ज्ञान की आवश्यकता होती है खासकर बिगनर्स को लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करते समय परेशानी होती है. अतः आपको लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करने से पूर्व कहीं चीजें का ज्ञान होना जरूरी होता है.
  • लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम में कई तरह के प्रोग्राम्स कार्य नहीं करते तथा लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम में निम्न मात्रा में कंप्यूटर हार्डवेयर सपोर्ट करते हैं साथ ही सभी ड्राइवर लिनक्स ओएस को सपोर्ट नहीं करते|

(MAC) os मैक ऑपरेटिंग सिस्टम क्या है पूरी जानकारी हिंदी में

      PANKAJ SIR 

Mac, जिसे Macintosh Computer भी कहा जाता है, एक Single-User Computer है, जिसे Apple Inc. द्वारा विकसित और बेचा जाता हैं. Mac को Apple Macintosh, Apple Mac, Thin Mac एवं Fat Mac आदि नामों से भी जाना जाता हैं 
Mac दुनिया का पहला Desktop Computer था, जिसमें Graphical User Interface – GUI का इस्तेमाल किया गया था. और इसमें एक Built-in Screen तथा Pointing Device के लिए Mouse का उपयोग किया गया
Macintosh Computers को पहली बार सन 1984 में प्रदर्शित किया गया था. उसके बाद 1998 से इन्हे Mac नाम से प्रदर्शित किया गया जाने लगा. यह कार्य Macintosh Computers को PC से अलग दिखाने के लिए किया गया.
शुरुआती Mac Computers में Motorola 68,000 Series के Microprocessor का इस्तेमाल हुआ था. जिन्हे बाद में PowerPC Processors द्वारा Replace कर दिया गया. Motorola Processors के अलावा पहला Mac निम्न फीचर के साथ बाजार में उतारा गया था.
  • Motorola 68,000 Chip
  • 512 x 342 Black and White Built-in Monitor
  • 128K RAM
  • Floppy Drive

Mac Computer की विशेषताएँ

  • Mac Computers में पहली बार GUI – Graphical User Interface तकनीक का इस्तेमाल किया गया.
  • इन्हे केवल सिंगल युजर के लिए विकसित किया गया था.
  • Mac Computers के द्वारा किसी कार्य को करने के लिए Commands की जरूरत नहीं थी. अब ये कार्य Mouse द्वारा किया जा सकता था.
  • इनकी कीमत थोडी ज्यादा थी मगर Mac Computers का सरल डिजाईन और छोटा आकार युजर को बहुत पसंद था.

Mac और PC में अंतर – Differences Between Mac and PC in Hindi

Mac भी एक Personal Computer हैं!
चौंक गए ना. चिंता मत कीजिए. आप अकेले नही है. दरअसल, Mac Computers को Single-User के लिए ही डिजाईन किया गया था. इसलिए इन्हे भी व्यक्तिगत कम्प्युटर ही कहा जाता हैं.
मगर, Apple अपने उत्पाद को उस समय के अन्य प्रचलित कम्प्युटरों से अलग दिखाना चाहती थी. इसलिए जान बूझकर Apple Inc. ने अपने Macintosh Computers से PC शब्द अलग रखा और सिर्फ Mac शब्द की ही Branding की और पहचान बनाई.
आज, Windows OS पर चलने वाले Computers PC कहलाते हैं. और Mac OS पर चलने वाले कम्प्युटरों को Mac कहा जाता हैं. मगर दोनों ही प्रकार के कम्प्युटर Personal Computers की श्रेणी में ही गिने जाते है.
Operating System अलग-अलग होने के कारण Mac और PC की कार्य-प्रणाली में कई सूक्ष्म अंतर होते है. जिनके बारे में संक्षिप्त में नीचे जिक्र किया जा रहा हैं.
  • Mac Computer में Mac OS का इस्तेमाल होता हैं और PC Computers में अधिकतर Windows OS का उपयोग किया जाता हैं.
  • मैक कम्प्युटर का डिजाईन बहुत ही शानदार, पतला और अलग (Unique) होत हैं. और PC डिजाईन के मामले में 19 ही साबित होते हैं.
  • Windows PC और Mac Computers दोनों कम्प्युटरों की विशेषताएं लगभग समान होती हैं. मगर गुणवात और प्रदर्शन के मामलें में Mac से पीछे रह जाते हैं.
  • PC Users को Connectivity के ज्यादा विकल्प उपलब्ध करवाता हैं. लेकिन, Mac इस मामले में कंजूस साबित होता हैं और केवल सीमित मात्रा में विकल्प देता हैं|

कंप्यूटर विंडोज क्या है हिन्दी में



Window कंप्यूटर का ओ एस  यानि ऑपरेटिंग सिस्टम है  जिसे  कंप्यूटर  की आत्मा माना जाता है  जिसके बिना कंप्यूटर नहीं चल सकता |
Window शब्द माइक्रोसॉफ्ट के GUI ऑपरेटिंग सिस्टम Ms Windows के विभिन्न संस्करणों के लिए उपयोग किया जाता है जिसमे हमे एक ऐसा वातावरण मिलता है जिसमे सभी सुविधाए चित्रात्मक रूप में आइकॉन, मेन्यु, बटनों आदि के रूप में मिलती है | इस 
 सिस्टम का नाम विंडोज इसलिए रखा गया क्योकि इसमें प्रत्येक सॉफ्टवेयर एक आयताकार ग्राफ़िक्स बॉक्स के रूप में खुलता है, जो खिड़की की चौखट के सामान होता है और जिसके माध्यम से हम आज कंप्यूटर को  केवल की-बोर्ड से टाइप होने वाले अक्षरों से निकलकर एक नए वातावरण के रूप में देख पाए | यह चित्रात्मक वातावरण कंप्यूटर की दुनिया को रोचक और सरल बनाने क्र द्रष्टि से बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है |
Windows सबसे पहले डॉस ऑपरेटिंग सिस्टम के अंतर्गत एक सॉफ्टवेयर के रूप में आया जिसका windows 3.1 संस्करण बहुत लोकप्रिय हुआ | इसके बाद सन 1995 में यह windows 95 के नाम से एक संपूर्ण ऑपरेटिंग सिस्टम के रूप में जारी हुआ जिसके अब तक Windows 95, Windows 98, Windows 2000, Windows Me, Windows XP, Windows NT, Windows Vista, Windows 7, Windows 8, Windows 8.1, Windows 10 आदि अनेक संस्करण जारी हुए|

Modem क्या है 1 -और कितने प्रकार के होते हैं====!

Modem का Full Form होता है “Modulator / Demodulator.” यह एक ऐसा hardware component होता है जो की allow करता है एक computer या दुसरे device क...